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IGNOU MHD-02 (July 2025 – January 2026) Assignment Questions
सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
1.मैथिलीशरण गुप्त की कविता में राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
2. साकेत लिखने की प्रेरणा गुप्त जी को कहाँ से प्राप्त हुई है? यह काव्य किस श्रेणी का है इसका औचित्य को सिद्ध किजिए।
3.”निराला राग और विराग के कवि हैं” इस कथन की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
4. प्रसाद की काव्य भाषा का वैशिष्ट्य बताइए।
5. निम्नलिखित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
(क) हा! हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई।
अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी।
पै घन बिदेस चलि जात इहै अति ख्वारी।
ताहू पै महंगी काल रोग विस्तारी।
दिन-दिन दूनो दुख ईसश् देत हा हारी।।
सबके ऊपर टिक्क्सश की आफत आई।
हा! हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई।
(ख) हे साधुओ ! सोये बहुत, अब ईश्वराराधन करो,
उपदेश द्वारा देश का कल्याण कुछ साधन करो।
डूबे रहोगे और कब तक हाय! तुम अज्ञान में?
चाहो तुम्हीं तो देश की काया पलट दौ आन में।।
थे साधु तुलसीदास, नानक, रामदास समर्थ भी
व्यवहृत यही पद हो रहा है आज उनके अर्थ भी।
पर वे न होकर भी यहाँ उपकार सबका कर रहे,
सद्भाव उनके ग्रन्थ सबके मानसों में भर रहे
(ग) नील परिधान बीच सुकुमार
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग
खिला हो ज्यों बिजली का फूल
मेघ-बन बीच गुलाबी रंग।
आह ! वह मुख ! पश्चिम के व्योम
बीच जब घिरते हों घन श्याम
अरुण रवि मंडल उनको भेद
दिखाई देता हो छविधाम । –
(घ) धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध,
धिक् साधन, जिसके लिए सदा ही किया शोध ।
जानकी! हाय, उद्धार प्रिया का न हो सका।
वह एक और मन रहा राम का जो न थका
जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय
कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय,
बुद्धि के दुर्ग पहुँचा, विद्युत् गति हतचेतन
राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन।
IGNOU MHD-02 (July 2024 – January 2025) Assignment Questions
1. भारतेंदु की कविता में राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है । सोदाहरण स्पष्ट कीजिए ।
2. साकेत लिखने की प्रेरणा गुप्त जी को कहाँ से प्राप्त हुई है? यह काव्य किस श्रेणी का है इसका औचित्य को सिद्ध किजिए ।
3. “निराला राग और विराग के कवि हैं इस कथन की सार्थकता सिद्ध कीजिए ।
4. अज्ञेय की काव्य भाषा का वैशिष्ट्य बताइए ।
5. निम्नलिखित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए ।
(क) सब गुरुजन को बुरो बतावै ।
अपनी खिचड़ी अलग पकावै ।
भीतर तत्व न झूठी तेजी ।
क्यों सखि सज्जन नहिं अंगरेजी ।
तीन बुलाए तेरह आवैं।
निज निज बिपता रोई सुनावैं ।
आँखों फूटे भरा न पेट ।
क्यों सखि सज्जन नहिं ग्रेजुएट ।
(ख) विषमता की पीड़ा से व्यस्त
हो रहा स्पंदित विश्व महान;
यही दुख सुख विकास का सत्य
यही भूमा का मधुमय दान ।
नित्य समरसता का अधिकार,
उमड़ता कारण जलधि समान;
व्यथा से नीली लहरों बीच
बिखरते सुख मणि गण द्युतिमान |
(ग) है अमानिशा उगलता गगन घन अन्धकार;
खो रहा दिशा का ज्ञान; स्तब्ध है पवर-चार;
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल;
भूधर ज्यों धन-मग्न; केवल जलती मशाल ।
स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय,
रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-जय;
जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य – श्रान्त
एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त
कल लड़ने को हो रहा विकल वार बार-बार
असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार-हार ।




